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कविता

गाओ
महेंद्र भटनागर


गाओ कि जीवन - गीत बन जाये !

हर कदम पर  आदमी  मजबूर है,
हर  रुपहला  प्यार-सपना  चूर है,
आँसुओं के सिंधु में   डूबा  हुआ
आस-सूरज   दूर,  बेहद  दूर है !
           गाओ कि कण-कण मीत बन जाये !

हर तरफ  छाया अँधेरा  है  घना,
हर हृदय हत,  वेदना  से है सना,
संकटों का  मूक  साया  उम्र भर
क्या रहेगा  शीश पर  यों ही बना ?
           गाओ,  पराजय - जीत बन जाये !

साँस पर  छायी विवशता  की घुटन,
जल रही है  जिंदगी भर कर जलन,
विष भरे घन-रज कणों से है भरा
आदमी की   चाहनाओं   का गगन,
           गाओ कि दुख - संगीत बन जाये !


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