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कविता

हर गंगे
पूर्णिमा वर्मन


नैया डोले
बगुले बोले
हर हर गंगे, हर गंगे !

बजी घंटियाँ हुई आरती
सुबह हो गई काशी में
नई नई हलचल हो आई
गाय गली संन्यासी में
गुमटी खोले
दूध उड़ेले
हर हर गंगे, हर गंगे !

हलवाई की खुली दुकानें
चाय चली कुल्हड़ वाली
अखबारों के पन्ने खोले
बहस जमी हुल्लड़ वाली
गरम चाय के
हंडे खौले
हर हर गंगे, हर गंगे !

उजली गंगा धुली सीढ़ियाँ  
चंचल लहरें शांत किनारे
धीरे धीरे भक्त उतरते
धूप दीप नैवेद्य सम्हारे
दर्शन कर लो
पंडे बोले
हर हर गंगे, हर गंगे !


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