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कविता

बिटिया
त्रिलोक सिंह ठकुरेला


बिटिया !
जरा सँभल कर जाना,
लोग छिपाए रहते खंजर।

गाँव, नगर
अब नहीं सुरक्षित
दोनों आग उगलते,
कहीं कहीं
तेजाब बरसता,
नाग कहीं पर पलते,
शेष नहीं अब
गंध प्रेम की,
भावों की माटी है बंजर।

युवा वृक्ष
काँटे वाले हैं
करते हैं मनभाया,
ठूँठ हो गए
विटप पुराने
मिले न शीतल छाया,
बैरिन धूप
जलाती सपने,
कब सोचा था ऐसा मंजर।

तोड़ चुकीं दम
कई दामिनी
भरी भीड़ के आगे,
मुन्नी, गुड़िया
हुईं लापता,
परिजन हुए अभागे,
हारी पुलिस
न वे मिल पाईं,
मिला न अब तक उनका पंजर।  


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