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कविता

मिलकर पढ़ें वे मंत्र
त्रिलोक सिंह ठकुरेला


आइए, मिलकर पढ़ें वे मंत्र।

जो जगाएँ प्यार मन में,
घोल दें खुशबू पवन में,
खुशी भर दें सर्वजन में,
कहीं भी जीवन न हो ज्यों यंत्र।

स्वर्ग सा हर गाँव घर हो,
संपदा-पूरित शहर हो,
किसी को किंचित न डर हो,
हर तरह मजबूत हो हर तंत्र ।

छंद सुख के,  गुनगुनाएँ,
स्वप्न को साकार पाएँ,
आइए,  वह जग बनाएँ,
हो जहाँ सम्मानमय जनतंत्र। 


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