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कविता

बिहान
केसरीनाथ त्रिपाठी


रात कट गई, हो गई है भोर
रवि रश्मियाँ बढ़ीं धरा की ओर
है कर्म का आह्वान,
लो आ गया बिहान लो आ गया बिहान।

पंख फड़फड़ा कर पखेरू हैं उड़ चले
रँभा रही हैं गाय भी छप्‍परों तले
साँकलें खनक रहीं, मुर्गे की लगी बाँग
उठ रही चारपाइयाँ, उठ रहे बिछान
चल पड़ा है खेत को हल लिए किसान
ओस सिंची भूमि पर पाँव के निशान।
लो आ गया बिहान।

नीम की दातौन कहीं कोयले की पीस
स्‍नान कर रहा कोई कपड़ा रहा है फींच
कुछ खेत में अँधेरे से पलेवा कर रहे
उठ गए गदेलुआ, कलेवा कर रहे
कागा दिखा मुंडेर पर दादी तो खुश हुई
दादा से बोलीं आज तो आएँगे मेहमान
लो आया गया बिहान।

हाथ में लिए कुदाल, लेकर खुरपियाँ
श्रमिक चल पड़ा, चल पड़ी है चरखियाँ
कोल्‍हू के बैल चल पड़े, घानी भी भर रही
मोट के लिए कहीं है नार बट रही
चल पड़ी रहट, लोग काम पर चले
कोठिये में भर रह अनाज नौजवान
लो आ गया बिहान।

भट्टियों में कोयला दिया लुहार ने
चाक भी नचा दिया उठ कर कुम्‍हार ने
ड्योढ़ी पर जल गया बाबा का भी हुक्‍का
बीड़ी का खींच कश, जोता जुम्‍मन ने भी इक्‍का
दर्जी ने शुरू कर दिया सिलना नए परिधान
लो आ गया बिहान।

कुछ ने लिए गँड़ास, चलो कुट्टियाँ काटें
सुतुही व पहुसुली की धार, सब्जियाँ काटें
दालान में चली बहुरिया दही बिलोने
मूसल से ओखली में कोई धान कूटने
पीसे कोई चकरी में दाल, जाँते से आटा
चहुँ ओर दीखता यहाँ है कर्म का सम्‍मान
लो आ गया बिहान।

पीठ पर लादी हुई हैं भारी पोथियाँ
झाँकती थैले से कहीं काली तख्तियाँ
बालक हैं चल पड़े शाला की बाट पर
चल पड़ा बढ़ई का रंदा भी काठ पर
लादी धरे पीठ, बरेठा भी चल पड़ा
मास्‍टर जी जल पड़े मुँह में दबाकर पान
लो आ गया बिहान।

नाऊ की चली कचकचा छोटी-बड़ी कैंची
धूनी रमाई साधु ने, ले हाथ चिलमची
गोबर की टीप पोंछ ली, पनही चमक गई
साइकिल में हवा डाल दी, बाँछें भी खिल गई
ग्‍वाले बढ़े शहर को, लादे दो-दो टंकियाँ
दफ्तर के लिए बड़कऊ बाबू का भी पयान
लो आ गया बिहान।

ले बालटी कहार जुटा कुआँ जगत पर
सतनरायन की कथा प्रधान जी के घर
पंडित जी भर रहे हैं कठौता में पँजीरी
फल-फूल, पंचामृत है, कठौती में है पूरी
आम की चैली से हवन, बत्ती, दही, घी
हल्‍दी से पीढ़े पर बना नवग्रह का है निशान
लो आ गया बिहान।

कंडियों, उपलियों का दीखता धुआँ
पायलों की धुन से घिर गया कुआँ|
सोहरें कहीं, कहीं पनिहारिनों के गीत
लाड़ले लाड़ली गोद में टँगे टुकुर-टुकुर
कर रहे ममत्‍व की पहचान
लो आ गया बिहान।

बैठ बैलगाड़ी विदा हो रही बेटी
माँ-बाप, काका-काकी से हो रही भेंटी
लाकर पड़ोसिन ने दिया दीवट व चिरौंटा
अनखा टिपाया भौजी ने झट खोल कजरौटा
चल पड़ी पिचकारी फिर छोटी के हाथ से
पाहुन के जामा-जोड़ा पर है रंग का निशान
लो आ गया बिहान।

गोइयाँ किधर गई, उसे गोइयाँ गोहारती
चौपड़ की गोट हाथ ले, रस्‍ता निहारती
सरहद तक गाँव की, चले सब लोग छोड़ने
बहूरानी बोली रुक जरा चद्दर तो ओढ़ लें
अटारियों से बरसते अक्षत के हैं चावल
नाइन तो किए जा रही बिटिया का ही बयान
लो आ गया बिहान।

जिंदगी है जाग उठी, क्‍या हुआ बिहान
क्रिया हर जगह दिखी, कर्म के प्रमाण
पर अभी भी बहुत से पड़े प्रमाद में
प्रासाद में पड़े हैं या डूबे विषाद में
झकझोर दें उन्‍हें, करें समय की वह पहचान
जो सो गया उसका, सदा को सो गया बिहान
लो आ गया बिहान।

हमारा भी यह बिहान, तुम्‍हारा भी यह बिहान
देश का बिहान, यह तकदीर का बिहान
ठान लो कि काम से डरोगे अब नहीं
मान लो कि आज से थकोगे अब नहीं
दो वचन कि आज से रुकोगे अब नहीं
है बदल रही विधा, बदल दो अब विधान
लो आ गया बिहान।


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