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कहानी

कथा संस्कृति
खंड : दो
कथा भूमि


संपादन - कमलेश्वर

अनुक्रम नागासाकी पर सौ सूर्यों की रोशनी - फ्रैंक डब्लू चिनाक पीछे     आगे

विडम्बना देखिए, अणु बम फेंकने के लिए निर्धारित जिन चार स्थानों की सूची अमरीकी युद्धमन्त्री हेनरी एच. स्टिमसन के सामने विचारार्थ प्रस्तुत की गयी थी, उसमें नागासाकी का नाम कहीं नहीं था। फिर, दुर्भाग्य की बात यह रही कि शेष विश्व की तरह जापान में भी सभी का ध्यान हीरोशिमा पर ही केन्द्रित होकर रह गया। नागासाकी के महाविनाश को प्रायः भुला दिया गया। नागासाकी के बुद्धिजीवी आज भी यह गिला करते सुने जा सकते हैं - ‘‘एटम बम का शिकार होना तो बुरा है ही, लेकिन दूसरे नम्बर के एटम बम का शिकार होना उससे भी बुरा है!’’ यहाँ नागासाकी की उस अकल्पनीय अणु-प्रलय का रोमांचकारी वर्णन प्रस्तुत है।

सरकारी कैलेण्डरों पर तारीख बदल चुकी थी - 9 अगस्त, 1945। 8 अगस्त की रात अभी कुछ ही देर पहले समाप्त हुई थी। 2 बज कर 56 मिनट हुए थे।

तिविरान द्वीप की दो मील लम्बी हवाई पट्टी महाविनाश के दूत को विदाई देने की मौन प्रतीक्षा में थी। बी-29 विमान को उड़ान भरने के लिए इस लम्बाई के हर इंच की जरूरत थी। इस विमान पर केवल एक बम लदा हुआ था। यह बम किसी भीमाकार तरबूज-सा था और इसका वजन 10,000 पौण्ड था। इसके अतिरिक्त प्रशान्त सागरीय इस वैमानिक अड्डे से जापान तक और वापसी यात्रा की 3400 मील की दूरी तय करने के लिए आवश्यक कई टन ईंधन भी इस विमान से जुड़ा हुआ था।

इस बी-29 पर जो बम लदा हुआ था, वह अणु बम था। जापान ने घोषणा की थी कि वह अपनी धरती पर दुश्मन के उतर आने पर भी आखिरी खाई, आखिरी इंच तक युद्ध जारी रखेगा। अमरीका ने जापान की इस चुनौती का जवाब अणु बम से देने का निश्चय किया था।

6 अगस्त को पहला अणु बम हीरोशिमा पर डाला गया था। आज के इस दूसरे अणु बम का निशाना 4,00,000 की आबादी का औद्योगिक नगर कोकुरा था। वहाँ जापान की सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा गोला-बारूद बनाने वाली फैक्टरियाँ थीं।

धीरे-धीरे वह उड़ता हुआ किला-बी-29 विमान-बादलों से ऊपर उठ गया, और मेजर चार्ल्स स्वीनी ने चैन की साँस ली। अचानक मेजर चिल्लाया - ‘‘पावर टू!’’ इसका मतलब था कि वह विमान की उड़ान के लिए निर्धारित ऊँचाई तक ले जाने वाली शक्ति और रफ्तार की माँग कर रहा था।

विमान 7000 फीट की ऊँचाई पर पहुँचकर सीधा आगे बढ़ने लगा। विमान पर सवार 13 व्यक्ति यात्रा के लिए अपने-अपने स्थान पर जम गये। गति थी 220 मील प्रति घण्टा।

प्रातः नौ बजकर पचास मिनट पर नीचे बिछा हुआ कोकुरा नगर नजर आने लगा। इस समय बी-29 विमान 31,000 फीट की ऊँचाई पर उड़ रहा था। बम इसी ऊँचाई से गिराया जाना था। नगर के ऊपर बादल बिखरे हुए थे।

बीहन चिल्लाया - ‘‘मुझे शस्त्रागार कहीं नजर नहीं आ रहा है। एक बार फिर घूमकर हमें निशाने के ऊपर से गुजरना होगा।’’

स्वीनी ‘इण्टरकॉम’ पर बोल उठा, ‘‘बम मत गिराना। फिर से सुन लो, बम मत गिराना ...हम दूसरी दिशा से निशाने पर, पहुँचने की कोशिश करेंगे।’’

कुछेक मिनट के बाद ही स्वीनी पूर्व की ओर से आकर नगर के ऊपर उड़ान भरने लगा। लेकिन अन्तिम क्षण में शहर पर घिरे धुएँ ने एक बार फिर सब गड़बड़ कर दिया।

नीचे से विमान-भेदी अग्निवर्षा खतरनाक हद तक शुरू हो गयी थी। स्वीनी को पता था कि कोकुरा की रक्षा के लिए सारे जापानी साम्राज्य के दक्षतम तोपची तैनात किये गये हैं। उसने अन्तिम प्रयास के लिए चेतावनी दी - ‘‘हम एक बार फिर कोशिश करेंगे - उत्तर की ओर से आकर।’’

लेकिन तीसरी बार भी सफलता नहीं मिली।

तभी सार्जेण्ट कुहारेक की आवाज सुनाई दी - ‘‘ईंधन कम होता जा रहा है ...अब हमारे पास केवल इतना ही ईंधन बचा है कि हम लौटकर ईवो तक पहुँच सकेंगे!’’

लेकिन स्वीनी फैसला कर चुका था कि वह अणु बम को लेकर वापस नहीं लौटेगा। यहाँ विफल होने पर एक दूसरा लक्ष्य साधा जा सकता था। एशवर्थ से पूछा गया, तो उसने भी सहमति दे दी। स्वीनी ने दायीं ओर झुककर विमान को एकदम मोड़ दिया और घोषणा कर दी-हम लोग नागासाकी की ओर बढ़ रहे हैं।

उस वर्ष ग्रीष्मकाल में जापान के तमाम बड़े-बड़े नगर अमरीकी हवाई हमलों के दायरे में आ चुके थे। लेकिन इस सारी विनाशलीला के बीच नागासाकी लगभग अछूता ही बच गया था। यद्यपि यहाँ भी कई ऐसे बिन्दु थे, जिन्हें अमरीकी हवाबाज दुनिया के नक्शे से मिटा देना चाहते थे। मित्सुबिशी का शस्त्रास्त्र कारखाना यहीं था, जिसमें बने तारपीडो पर्ल हार्बर के सर्वनाश का कारण साबित हुए थे।

उसी सुबह एक 29 वर्षीया अध्यापिका ती अदाची, जिसका पति इसी युद्ध में मारा गया था, नाश्ते की मेज पर बैठी-बैठी अपने रेडियो से छेड़खानी कर रही थी। तभी उसके कानों में किसी अमरीकी रेडियो प्रसारण केन्द्र से प्रसारित ये शब्द पड़े - ‘‘6 अगस्त को, सुबह आठ बजकर पन्द्रह मिनट पर, हीरोशिमा नगर पर एक नया बम गिराया गया। कई हजार लोग मारे गये। इन लोगों के शरीर अविश्वसनीय शक्ति वाले बम के विस्फोटक के भभके से ही छिन्न-भिन्न हो गये ...अगर जापानी सेनाओं ने तुरन्त आत्मसमर्पण नहीं किया, तो सर्वनाश का यह क्रम जारी रखा जाएगा...’’

श्रीमती अदाची का सर्वांग काँप गया। उसे याद आया - पिछली शाम शत्रु पक्ष ने नागासाकी नगर पर पर्चे बरसाये थे, जिनमें नगरवासियों को नगर खाली कर देने की सलाह दी गयी थी। इनमें लिखा था - ‘‘अप्रैल में नागासाकी में फूलों की बहारें थीं, अगस्त में नाकासाकी पर आग की फुहारें होंगी।’’

मेजर स्वीनी के चेहरे पर भयंकर तनाव की रेखाएँ उभर आयीं। अगर उन्हें ओकिताबा वापस पहुँचना था, तो वे नागासाकी के ऊपर सिर्फ एक चक्कर काट सकते थे। इससे अधिक ईंधन उनके पास नहीं था। स्वीनी ने कमाण्डर एशवर्थ को समस्या की जानकारी दी - ‘‘बीहन का ख्याल है कि खुली आँखों से देखकर निशाने पर बम गिराना मुमकिन नहीं है। मेरा विचार है कि बम को रडार की मदद से गिरा दिया जाए।’’

एशवर्थ ने बीहन से पूछा, ‘‘रडार की मदद से कितना ठीक निशाना साधा जा सकता है, बीहन?’’

‘‘मैं गारण्टी कर सकता हूँ, सर, बम निशाने के केन्द्र-बिन्दु के एक हजार फीट के दायरे से बाहर नहीं गिरने पाएगा,’’ स्वीनी ने उत्तर दिया।

‘‘ओ.के., स्वीनी, बम को रडार की मदद से ही डालो!’’ एशवर्थ ने क्षण भर सोचकर आज्ञा दे दी।

अचानक बीहन चीखा, ‘‘रडार पर शहर नजर आ रहा है! वह रहा निशाना...वह रहा मित्सुबिशी का जहाज कारखाना...’’ स्वीनी ने विमान की बागडोर तत्काल बम्बार्डियर के हवाले कर दी।

बीहन ने बिना झिझके बम गिराने वाले स्वचालित उपकरण को चालू कर दिया। और कुछ ही क्षण बाद वह भीमकाय बम तेजी से धरती की ओर बढ़ा जा रहा था।

बी-29 से जैसे ही बम गिरा, उसके भीतर फिट किये गये स्वचालित यन्त्र, उपकरण सक्रिय हो उठे। 52 सेकेण्ड तक निरन्तर गिरते रहने के बाद बम पृथ्वी तल से 500 फीट की ऊँचाई पर फट गया। समय था - 11 बजकर 2 मिनट!

विस्फोट के बाद अधर में ही आग का एक भीमकाय गोला लटक गया। इस गोले के केन्द्र में तापमान था - 10 करोड़ डिग्री सेण्टीग्रेड। एक मील दूर से देखने पर भी इस आग के गोले की चमक सूर्य की चमक से सौ गुना अधिक थी। एक सेकण्ड के अन्दर ही गोले का व्यास 200 गज हो चुका था और निरन्तर फैलता हुआ यह गोला तेजी से सारे नगर को निगलने जा रहा था।

नागासाकी का सागर-तट ज्वाला की लपेट में आये नगर की परछाइयों से ही सुर्ख हो चुका था। पानी की सतह पर तैरती, बन्दरगाह में खड़ी हुई तमाम नौकाओं में आग लग गयी थी। तीन हजार फीट के दायरे में मौजूद कोई भी व्यक्ति यह जान ही नहीं पाया कि क्या हो गया है! घटित का रंचमात्र आभास होने के पहले ही वे मर चुके थे!

एक टेलीफोन लाइनमैन सेईची मुरासाकी एक बीस फुट ऊँचे खम्भे पर चढ़ा काम कर रहा था, अचानक सौ सूर्य चमके और वह गर्मी से ही सुलझकर राख हो गया।

आठ वर्ष का एक बच्चा मात्सुओ अपने छह अन्य साथियों के साथ लुका-छिपी का खेल खेल रहा था। एक सेकण्ड में उसका नामोनिशान तक मिट गया।

उराकामी जेल में 95 कैदी और 15 गार्ड मारे गये। जेल की मजबूत इमारत का निशान भी नहीं बचा। अन्धे-बहरे बच्चों के संस्थान में 42 बच्चे थे, जो विस्फोट की चमक को न देख सकते थे और न धमाका सुन सकते थे। वे जहाँ, जिस स्थिति में थे, वहाँ, उसी स्थिति में कोयले के बुत बने रह गये। सारे शहर में झुलसने, जलने वाली इकाइयाँ दहाइयाँ बनती गयीं, दहाइयाँ सैकड़ों में बदलीं, सैकड़े हजार, दस हजार बनते चले गये।

नागासाकी नगर में उस समय 50,000 इमारतें थीं, जिनमें से कम-से-कम 20,000 इमारतें पूरी तरह ध्वस्त हो गयीं। जापानी अधिकारियों के अनुसार 74800 व्यक्तियों की जानें गयीं और 75000 व्यक्ति बुरी तरह घायल हो गये।

इस महाविनाश की तेज रफ्तार का अन्दाज इसी से लगाया जा सकता है कि एक ग्यारह वर्ष का बालक कोइची ग्यारह बजे के लगभग कुछ अन्य बच्चों के साथ तैरने की पोशाक पहने उराकामी नदी के तट पर खड़ा था। वे लोग एक छोटी-सी घण्टी को पानी में फेंक देते थे और फिर डुबकी लगाकर खोज लाने की कोशिश करते थे। सबसे पहले घण्टी खोजकर लाने वाला विजेता होता था। इस बार घण्टी खोजने की बारी कोइची की थी। उसने पानी में छलाँग लगायी और लगभग एक मिनट पानी में रहा। जैसे ही उसने पानी की सतह से सिर निकाला, वह हक्का-बक्का रह गया। उसके सभी साथी नदी तट के रेत पर मरे पड़े थे।

नागासाकी के बम-विस्फोट में जो लोग बच गये थे, वे मात्र संयोग से ही बचे थे। एक व्यक्ति तीन फीट की एक दीवार के पीछे उकड़ूँ बैठा अपने घर की फुलवारी निरा रहा था। उसके पास ही उसकी पत्नी खड़ी कुछ राय दे रही थी। जब विस्फोट हुआ, तो उसकी पत्नी अचानक बोलते-बोलते रुक गयी। विस्फोट की गर्मी का भभका उसकी दीवार के ऊपर से ही गुजर गया था और साथ ही उसकी पत्नी को भी लेता गया था।

शहर के एक व्यवसायी क्षेत्र में एक व्यापारी अपनी सेक्रेटरी से कुछ कागजात ले रहा था। कुछ कागज मेज के नीचे गिर गये। जैसे ही वह कागज उठाने मेज के नीचे झुका, कमरे की दीवारें टूटकर गिर गयीं, जब मलवा हटाया गया, तो व्यापारी मेज के नीचे जिन्दा था और उसकी सेक्रेटरी मर चुकी थी।

युद्ध मन्त्री और अन्य सैन्याधिकारी आत्मसमर्पण के पक्ष में फिर भी नहीं थे लेकिन प्रधान मन्त्री कान्तारों सुजुकी ने बम विस्फोट के कुछ ही घण्टों बाद एक संकटकालीन बैठक बुलायी। जापानी परम्परा के विपरीत सम्राट स्वयं उस बैठक में उपस्थित हुए और घोषणा की - ‘‘मैंने तुरन्त युद्ध समाप्त कर देने का फैसला कर लिया है।’’ सम्राट का फैसला सुनकर कई जनरलों ने आत्महत्याएँ कर लीं। लेकिन सम्राट अपने फैसले पर अडिग रहे और छह दिन बाद, 15 अगस्त को जापान ने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया।


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