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कविता

जंगल उग आए
धनंजय सिंह


भाव-विहग उड़ इधर-उधर
दुख दाने चुग आए
मन पर घनी वनस्पतियों के
जंगल उग आए

चीते जैसी घात लगाएँ
कई कुटिलताएँ
मुग्ध हिरन की आँखों का
संवेदन समझाएँ

किस-किस बियाबान के कर्जे
जंगल भुगताए

हरे ताल की छाती पर
आ बैठी जलकुंभी
और किनारे पर कटिया ले
बैठे हो तुम भी

एक-एक पीड़ा के बाँटे
कितने युग आए 


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