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कविता

माँ का प्यार नहीं है
कमलेश द्विवेदी


यहाँ सभी सुख-सुविधाएँ हैं लेकिन सुख का सार नहीं है।
मिला शहर में आकर सब कुछ लेकिन माँ का प्यार नहीं है।
घर में खाएँ या होटल में,
मिल जाती है पूरी थाली।
लेकिन यहाँ नहीं मिल पाती,
रोटी माँ के हाथों वाली।
तन का सुख है पर मन वाला वो सुखमय संसार नहीं है।

अक्सर सपने में दिख जाते,
माँ के पाँव बिंवाई वाले।
धान कूटने में पड़ जाने,
वाले वो हाथों के छाले।
फिर भी घर के काम-काज से माँ ने मानी हार नहीं है।

हम सब होली पर रँग खेलें,
दीवाली पर दीप जलाएँ।
बच्चों के सँग हँसी-ख़ुशी से,
घर के सब त्यौहार मनाएँ।
पर सच पूछो तो माँ के बिन कोई भी त्यौहार नहीं है।

बच्चों के सुख की खातिर माँ,
जाने क्या-क्या सह लेती है।
हम रहते परिवार साथ ले,
पर माँ तनहा रह लेती है।
माँ के धीरज की धरती का कोई पारावार नहीं है।

अपने लिए नहीं जीती माँ,
सबके लिए जिया करती है।
घर को जोड़े रखने में वो,
पुल का काम किया करती है।
माँ के बिना कल्पना घर की करना सही विचार नहीं है।


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