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कविता

हरा नहीं हो सकता है
कमलेश द्विवेदी


जो जड़ से ही सूख गया हो
हरा नहीं हो सकता है।

जो भीतर से भारी होता
हल्की बात नहीं करता है।
वर्तमान की बातें करता
कल की बात नहीं करता है।

जो-पल पल ही छलक रहा हो
भरा नहीं हो सकता है।
जो जड़ से ही सूख गया हो
हरा नहीं हो सकता है।

सदा छल-कपट करने में ही
जिसके मन को है सुख मिलता।
जो जीवन में अपनाता बस-
धोखेबाजी और कुटिलता।

जो मन से ही खोटा हो वो
खरा नहीं हो सकता है।
जो जड़ से ही सूख गया हो
हरा नहीं हो सकता है।

जो नदिया की तरह न मीठा
और न सागर सा गहरा हो।
जिसमे ना पर्वत सा साहस
ना धरती सा धैर्य भरा हो।

वो नदिया-सागर-पर्वत या
धरा नहीं हो सकता है।
जो जड़ से ही सूख गया हो
हरा नहीं हो सकता है।

आओ छोड़े हर विकार हम
जीवन में सदुगुण अपनाएँ।
सबके हित में अपना हित है।
मन में ऐसे भाव जगाएँ।

हमसे अहित किसी का भी फिर
जरा नहीं हो सकता है।
जो जड़ से ही सूख गया हो
हरा नहीं हो सकता है।


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