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कविता

हम हो जाएँ गंगासागर
कमलेश द्विवेदी


तेरे भीतर एक नदी है
मेरे भीतर एक समंदर।
फिर भी जाने क्यों मैं प्यासा
रह जाता हूँ तुझसे मिलकर।

मैं जितना खारा था पहले
उतना ही हूँ अब भी खारा।
लेकिन जाने कहाँ खो गया
तेरा वो मीठापन सारा।
मुझको लगता इसीलिए मैं
प्यासा रह जाता हूँ अक्सर।

मुझमें अब भी उठतीं लहरें
यह मिलने की व्याकुलता है।
पर क्या तू भी इतना व्याकुल
इसका भेद नहीं खुलता है।
काश कभी तू मिलने आए
मन के सारे भेद भुलाकर।

पहली बार मिला था जब मैं
तू मुझको कितना भाया था।
गंगा जैसा पावन-पावन
तेरा रूप नजर आया था।
फिर मिल जाए वो पावनता
हम हो जाएँ "गंगासागर"।
तेरे भीतर एक नदी है
मेरे भीतर एक समंदर।


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