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कविता

सँवरेगा जो गाँव
अनिल कुमार


पाँवों में
घुँघुरू गाएगा
सँवरेगा जो गाँव।

हरियाएगा
रूप धरा का
मुस्काएगा पेड़
हरी घास से
हो जाएगी
हरी भरी हर मेड़,
स्वर्ग लगेगी
हर धनखेती
लग जाए जो दाँव।

फिर से मधुबन
रस भर देगा
रास रचेगा रोज
शुभ्र चाँदनी के
आते ही
मिट जाएगा सोज,
कहीं न होगी
रात अमावस
चमकेगा हर ठाँव।

सपनों के
खेतों में मोती
लटकेंगे हर डार
सोना-सा
चैपाल दिखेगा
हीरे-सा घर-द्वार,
चाँदी जैसा
उपवन होगा
पन्ना होगी छाँव।


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