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कविता

सृजन कहाँ है
अनिल कुमार


मीत! देख लो
नई नवेली
किरण कहाँ है ?

खेतों में या
नगर-गाँव की
झोपड़ियों में
कहीं रुका हो
सौ दुर्दिन की
फँस घड़ियों में,
अश्रु पोंछता
सरल तरल वह
हिरन कहाँ है ?

गोकुल-मथुरा
वृंदावन के
घने कुंज में
प्रेम जगत में
या ज्ञानी के
ज्ञान-पुंज में,
लिए सुदर्शन
लज्जा रक्षक
किशन कहाँ है ?

पेड़ काटता
वन-उपवन में
सौ बबूल का
डाल काटता
नागफनी के
तेज शूल का,
महाकाल-सा
विष पीता वह
सृजन कहाँ है ?


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