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कविता

परिवर्तन
अनिल कुमार


जाने क्यों
लगता है अपना
गाँव पराया ?

वह वट
जिसकी छाँव कभी
देती थी ममता
पीपल की भी
छाँह लिए थी
स्नेहिल समता,
क्यों, कब, कैसे
इन छाँवों में
भेद समाया ?

जो चौपाल
सदा गाता था
गीत प्रीत का
हर संझा
जोहा करता था
बाट मीत का,
वही आज
अनुदार हुआ
भूला भरमाया।

हर मुखड़ा
अब हुआ अपरिचित
अनजाना-सा
लगता है अब
भाव नयन का
बेगाना-सा
सोच रहा हूँ
यह परिवर्तन
कैसे आया ?


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