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कविता

गीत कहना सुनकर
रमेश दत्त गौतम


गीत कहना
आहटें सुनकर हवाओं की।

आहटों में ही
समय संजोग सब
भूल जाते
आहटों को लोग अब
आहटें बुनना
सँभल कर भावनाओं की।

आहटें मीठी कहीं
खट्टी कहीं
आहटें सोना कहीं
मिट्टी कहीं
साथ रखना आहटें
बूढ़ी दुआओं की।

एक रिश्ता
जोड़ती हैं
आहटें
एक रिश्ता
तोड़ती हैं आहटें
आहटें पहचानना
फिर मंथराओं की।


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