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कविता

लोकजन सहमे खड़े हैं
बृजनाथ श्रीवास्तव


क्या अजब
मंजर यहाँ का
लोकजन सहमें खड़े हैं।

एक दहशत घुस गई है
द्वार, कमरे, खिड़कियों में
भेद करना आज मुश्किल
आदमी में भेड़ियों में

क्या कहें
इस दौर को हम
लोग मुँह औंधे पड़े हैं।

हम कदम पर कत्लगाहें
रेल, बस, दिल्ली शहर में
लाष की लगती नुमाइश
भोर, संध्या, दोपहर में

हर गली
मुंसिफ, अदालत
जान के लाले पड़े हैं।

आज मृगछाला पहनकर
बाँचते मारीच प्रवचन
राजपुरुषों की कवायद
चल रहे हैं नाट्य प्रहसन

रोइये मत
राजधानी में
सभी चिकने घड़े हैं।


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