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कविता

सगुन पंछी
बृजनाथ श्रीवास्तव


सगुन पंछी
यहाँ अब क्या करें आकर
न पानी है, न दाना है।

पुराने अब नहीं है
पेड़ वे हरिताभ छाया के
फले हैं फल यहाँ पर
छद्म बौनी लोकमाया के

सगुनपंछी
यहाँ अब क्या करें बसकर
न डाली है, ठिकाना है।

सरोवर जलभरे अब तो
नहीं हैं गाँव में कोई
लिए आकाश सिर पर
यह टिटहरी रात भर रोई

सगुनपंछी
यहां अब क्या करें हँसकर
न मौसम है, तराना है।

शिकारी रात भर दिनभर
यहाँ पर जाल डाले हैं
सपेरे बीन पर गाते
नचाते नाग काले हैं

सगुनपंछी
यहाँ अब क्या करें रोकर
न दादा हैं, न नाना है।


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