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कविता

तो फिर बदला क्या ?
शीलेंद्र कुमार सिंह चौहान


राजा बदले, मंत्री बदले
           बदली राजसभा
ढंग न बदला राजकाज का
           तो फिर बदला क्या ?

निर्वाचन की गहमागहमी
           जब तब होती है
खर्च बढ़े तो कर्ज शीश पर
           जनता ढोती है
दल बदले, निष्ठाएँ बदलीं
           नारे बदल गए
नीति रही जैसी की तैसी
           तो फिर बदला क्या?

कर्ज कमीशन घटा न तिलभर
           सुविधा शुल्क बढ़ा
युवराजों ने विधि विधान को
           निज अनुरूप गढ़ा
कागज बदला, स्याही बदली
           बदल गई भाषा
अर्थ रहा जैसे का तैसा
           तो फिर बदला क्या ?

बंद मुट्ठियों में जिन हाथों
           थी जाड़े की धूप
नाच रही उनके ही आँगन
           बदले अपना रूप
मोहरे बदले, चालें बदली
           बदल गई बाजी
दाँव लगी द्रौपदी न बदली
           तो फिर बदला क्या ?


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