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कविता

रोटियों के पाँव गर होते
उदय शंकर सिंह उदय


कुनमुनाती हो
अदहन-सी
सनसनाती हो
भूख !
तुम कुछ
बोलती हो क्यों नहीं ?

क्यों अधर तक
बोल तेरी फूटती आकर नहीं
भूख की भाषा पढ़ी
स्कूल में जाकर नहीं
गुत्थियाँ मन की
बताओ
खोलती हो क्यों नहीं ?

भूख का अनुभव
कि भीतर लाल चिनगोरे सजोना
और नंगी आँत में
उसको पिरोना
बात तुम अब यह सभी से
खोलती हो क्यों नहीं ?

रोटियों के पाँव गर होते
दौड़ आती भुक्खड़ों के पास खुद
थी गई मीरा कि जैसे
कृष्ण के उस गाँव खुद
लय वही मीरा-सी तुम भी
घोलती हो क्यों नहीं ?


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