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कविता

समय के संदर्भ को
उदय शंकर सिंह उदय


फिर तुम्हें होकर मुखर
बहना पड़ेगा
जो नहीं अब तक कहा
कहना पड़ेगा।

अब नहीं बँधकर
अधिक है कसमसाना
है तुम्हें उस पार के भी
पार जाना।

खोल दो नव पंख
ज्योतिष कल्पना के
शून्य मन के भाव को
भरना पड़ेगा।

छोड़ दो, ओढ़ो न अब
ऐसी उदासी
देख किरणों ने बनाई
अल्पना-सी
रंग भर इसमें तुम्हें
उगना पड़ेगा।

डाल कांधे पर चलो
तुम पूर्ण घट को
और जी लो रस्सियों पर
एक नट को
समय के संदर्भ को
गहना पड़ेगा।


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