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कविता

गीत ने
उदय शंकर सिंह उदय


समय ने मुझको
जहाँ जब भी सताया
गीत ने मुझको वहाँ
तब-तब बचाया।

लड़खड़ाया तो लिया
धर हाथ हौले
ले गया कुछ दूर
अपनी बाँह खोले
झाड़ दी फिर धूल-सी
बैठी उदासी
और फिर इस गीत का
मुखड़ा सुझाया।

हुआ गिरने को
तो फिर अंधियारे में
दीपक-सा उजाला
टूट कर बिखरा नहीं
दुख के क्षणों में
बिखरने को जब हुआ
इसने सजाया।

दिया झोली भर
न जब कुछ पास में था
छत्र-चामर से सजाया
जब कि रंक-लिवास में था
मर गए डब-डब नयन
जब भी दरद से
होंठ पर तब हास है
इसने उगाया।


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