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कविता

नहीं पर...
रमेश चंद्र पंत


गाँव वही
घर वहीं,
नहीं है बाशिंदे बस।

बैठ
अलावों के सम्मुख
वे -
           सपने सुनने वाले।
खट्टी-मीठी
यादों के
वे -
           पंछी रहने वाले।
दीवारें
छत वही,
नहीं है अपनापन बस।

मौन
मुखर आवाजें रह-रह
भीतर -
           उतर रही हैं।
धुँधुआती
आँखें बापू की
सब कुछ -
           समझ रही हैं।
रहते हैं
सब-साथ
सुख न मिलता है बस।


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