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कविता

विश्व ग्राम में आम आदमी
ओम धीरज


विश्व ग्राम में आम आदमी
कैसे आज पले।

नाल-कटी शिशु बाहर आकर
माँग रहा चड्ढी,
इस पीढ़ी को क्या समझाएँ
अब ‘बुड्ढी-बुड्ढी’
तुतलाने की उम्र मोबाइल माँग रहा बच्चा
बड़े-बड़ों की अक्ल ठिकाने, खा जाए गच्चा।
देशी बाबू सोच विदेशी
माथ-पकड़ बैठे
कमतर-तेल, लपालप बाती
कब तक भला चले।

जंगल, खेत, पहाड़ निहारे
अब नागर राहें
नागर राक्षस-सा फैलाए
महा जबर बाहें
अपना खून पसीना देकर सींचे जो पौधे
बोया बीज गया था, लेकिन बिन माटी ‘शोधे’
पथराई आँखों से गँवई
बात यही बोले
फँसा पेड़ ‘आकाश-बँवर’ क्या
फूले और फले।

‘एक अनार बीमार हजारों’
कैसे साध पुरे
‘ब्रांड नेम’ पर मूल्य नौगुने
क्यूँ ना रोम जरे,
कच्चा माल गाँव से निकले साग-भाजियों से
कंपनियों के हाथ वापसी रत्न-मोतियों से
पगड़ी ‘माल-शाप’ के सम्मुख
खड़ी-खड़ी सोचे,
गिरवी गाँव, ‘बजार’-हाट सब
कैसे अब सँभले।


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