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कविता

जंगल तो फिर भी जंगल है
ओम धीरज


जंगल तो फिर भी जंगल है
शहर-गाँव क्या कम है
जंगल का कानून
जहाँ पर अब भी चलता है।

कहता है कानून
हमारे हाथ बहुत लंबे
पीछे बंधे हुए हैं फिर भी चढ़ते हम खंभे
धर्म भीड़ के कंधे चढ़कर नंगा नाच नचे
नारा-ए-तदबीर कहीं पर
है हर-हर गंगे,
तंत्र हुआ परतंत्र लोक भी वोटों के खातिर
धन पशु-बाहुबली के
हाथों गिरवी रहता है।

गोरैया पर चील झपट्टा
तब भी जारी है
दो रोटी को वृद्ध तरसते जीना भारी है
राशन कार्ड हाथ ले छूछी थाली पूछ रही,
कोटेदार शान से क्यूँ कर
चढ़े ‘सफारी’ हैं
प्रश्नों की बौछार ‘दिवारें’ सहती यह कहतीं
‘राज-काज में
ऐसा-वैसा चलता रहता है।

लाठी वाले हाथ
भैंस तो अब भी ले जाएँ,
थाना ‘ठकुर सोहाती’ उनके घर जाकर गाए,
बहू-बेटियाँ मृगा सरीखी
‘जबरे’ शेर बने, घायल तड़पें
नाम जुबाँ पर किंतु नहीं आए,
तक्षक-तक्षक रखें परीक्षित समझौता करके
सिंहासन पर इनका कब्जा
कायम रहता है।


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