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कविता

लोकतंत्र के कान्हा
जय चक्रवर्ती


लोकतंत्र के कान्हा खाएँ
खुद मिसरी-माखन
और भूख से
निशि-दिन
मरता सारा वृंदावन।

चारा-भूसा सबका
सब
नित ग्वाले खा जाएँ
तिनके-तिनके को
मारी-मारी
फिरती गायें

बूँद-बूँद गोरस को
तरसे
राधा का बचपन।

भरी सभा में
लूटी जाती
दुखिया-पांचाली
चीरहरण को देख
बजाते
सभाध्यक्ष ताली

दुर्योधन-दुःशासन
मिलकर
भोगें सिंहासन।

खून सने
यमुना के तट
वीरान कुंज-गलियाँ
पल दो पल की
मुस्कानों को
तरस रही कलियाँ

खड़े घात में
विषधर
पग-पग पर फैलाए फन।


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