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कविता

छाती में कुरुक्षेत्र समेटे
जय चक्रवर्ती


अंधों के आदेश
रात-दिन ढोता राजमहल
मिला हस्तिनापुर को
जाने किस
करनी का फल !

स्वयं कलुष के हाथों
बंधक है
राजा का मन
घुप्प अँधेरे में दिखलाए
कौन
किसे दर्पन !

शयनकक्ष से
सिंहासन तक
काजल ही काजल।

मिले शकुनि को
मान
झिड़कियाँ पाते रोज विदुर
राजसभा में
पारित होते दुर्योधन के
सुर

आँख-आँख पर
चढ़ी हुई है
स्वारथ की साँकल।

शरशय्या पर
पड़ी आस्था की
घायल साँसें
छाती में
कुरुक्षेत्र समेटे
लाशें ही लाषें

ऐसे में -
अब सर्वनाश की
काटे कौन फसल !


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