किसकी कौन कहे
हमाम में -
सबके सब नंगे !
बहरी राजसभा है सारी
अंधा राजा है।
बाहर-भीतर बंद महल का
हर दरवाजा है।
खुशहाली के इश्तहार
हर चौखट पर चिपके
यूँ बस्ती की हालत का
सबको अंदाजा है।
काजल की गंगा में
गूँज रही
हर-हर गंगे !
मुस्कानों पर अपना नाम
लिखा बटमारों ने
बिठा दिए हैं पहरे
चीखों पर जयकारों ने
अपने-अपने सम्मोहन के
इंद्रजाल रचकर -
नजर बाँध दी सबकी
मौसम के ऐयारों ने।
राजपाट का
गणित लगाते हैं
हिंसा-दंगे !