डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कविता

ये क्या किया !
जय चक्रवर्ती


आदमी की भूख ने
ये -
क्या किया !

धरा का पीकर
हरापन
पर्वतों के जिस्म नोंचे
लिया नदियों को
निगल
आकाश को मारे खरोंचे
हवाएँ अभिशप्त हैं
अब
फाँकने को संखिया !

बाढ़, सूखा, भुखमरी,
भूकंप,
बारूदी-घटाएँ
आदमी ने
खुद लिखी ये
मौत की त्रासद कथाएँ
चुप मगर
अब भी नहीं
ये सर्वग्रासी-भेड़िया !

किस तरह की
होड़ है ये
कौन-सी ये सभ्यता
भोगती तेजाब
चेहरे पर
प्रकृति की भव्यता
और जाएगी
कहाँ तक
ये निरंकुश प्रक्रिया !


End Text   End Text    End Text