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कविता

तीर्थंकर
विनय मिश्र


जिधर भी हाथ जुड़ते हैं
उधर है एक तीर्थंकर।

बड़ा पहुँचा जुआरी है
वो अपना दाँव खेलेगा
हराकर सिर्फ बातों से
तुझे अपना बना लेगा
पिघल जाएगा सब कुछ जो
दुखों में हो गया पत्थर।

किसी अंधे की आँखों का
वो सूखापन हरा कर दे
किसी लंगड़े को जब चाहे
वो मुश्किल में खड़ा कर दे
दुआओं में वो रखता है
कई अनहोनियों के स्वर।

कबूतर क्या करें लेकिन
लगी जब उनकी अर्जी है
शिकारी तीर मारे, जाल डाले
उसकी मर्जी है
तभी तो इस अहाते में
कई बिखरे मिले हैं पर।


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