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कविता

पीलिया
विनय मिश्र


शहर को कुछ हो गया है
पीलिया-सा।

आँखों में भी रंग है
उसका सजीला
यह नहीं कि
झूठ का है रंग पीला
रह रहा है सबमें कोई
भेदिया-सा।

आदतों में इक मशीनी
है कवायद
आदमी से चेतना की
गंध गायब
चेहरे में है कोई
बहुरूपिया-सा।

खोखलापन ढो रहे हैं
शब्द केवल
हम रोजाना सुर्खियों में
पी रहे छल
खींचती है रोज चुप्पी
हाशिया-सा।


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