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कविता

तकली
विनय मिश्र


किस मुश्किल में
नदिया कोई
आँखों से निकली।

वे बर्फीली शिखर न होंगे
होंगे लपटों के
जो मृगजल देने को आतुर
है छल कपटों के
मन कस्तूरी घूम रहा है अब
होकर तकली।

जलती बुझती चिंताओं के
चमके गहने हैं
विपदाओं के हमने जबसे
कपड़े पहने हैं
हरे भरेपन की जैसे हो
अब टूटी पसली।

एक अजनबीपन से सबका
चेहरा पुता हुआ
आपाधापी के कोल्हू में
जीवन जुता हुआ
कुर्सी क्या छूटी अपनों की
चाल ढाल बदली।


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