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कविता

सुनो तथागत
अजय पाठक


सुनो तथागत !
बोधिवृक्ष पर
अब कौओं की काँव-काँव है।

पंचशील अब कैद हो गया
है पुस्तक में
भिक्षुक-भंते समय काटते
हैं बक-झक में
देवदत्त से भरे हुए अब
गाँव-गाँव हैं।

शाक्यवंश ने अत्याचारी
राजा जनमें
दया-मोह का भाव नहीं है
उनके मन में
आँखों में अंगार होंठ पर
खाँव-खाँव है।

मठ में लंपट साधक बनकर
जमे हुए हैं
भोग-विलासों में सबके सब
रमे हुए हैं
मारा-मारी, गहमा-गहमी
चाँव-चाँव है।

‘‘बुद्धं शरणम् गच्छामि’’
की बातें छूटीं
कच्ची थी जो डोर आस की
वह भी टूटी
बोधगया के पथ में काँटे
पाँव-पाँव है।


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