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कविता

चढ़ती धूप
जगदीश व्योम


चढ़ती धूप
उतरता कुहरा
कोंपल अँखुआई
नए वर्ष में
नवगीतों की
फिर बगिया लहराई।

मन कुरंग
भर रहा कुलाँचें
बहकी
गंध-भरी पुरवाई
ठिठुरन बढ़ी
दिशाएँ बाधित
चंद्र-ग्रहण ने की अगुआई
फिर से आज बधाई
सबको
सौ-सौ बार बधाई।

सारस जोड़ी
लगीं उतरने
होने लगीं कुलेलें
विगत साल की
उलझी गुत्थी
चोंच मिलाकर खोलें
मंत्र-मुग्ध हो गई किसानिन
सकुची, खड़ी, लजाई
फिर से आज बधाई
सबको
सौ-सौ बार बधाई।


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