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कविता

सूरज इतना लाल हुआ
जगदीश व्योम


जाने क्या हो गया, कि
सूरज इतना लाल हुआ।

प्यासी हवा हाँफती
फिर-फिर पानी खोज रही
सूखे कंठ-कोकिला
मीठी बानी खोज रही
नीम द्वार का, छाया खोजे
पीपल गाछ तलाशे
नदी खोजती धार
कूल कब से बैठे हैं प्यासे
पानी-पानी रटे रात-दिन
ऐसा ताल हुआ।

सूने-सूने राह, हाट, वन
सब कुछ सूना-सूना
बढ़ता जाता और दिनों-दिन
तेज धूप का दूना
धरती व्याकुल, अंबर व्याकुल
व्याकुल ताल-तलैया
पनघट, कुआँ, बावड़ी व्याकुल
व्याकुल बछड़ा गैया
अब तो आस तुम्ही से बादल,
क्यों कंगाल हुआ।


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