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कविता

सिमट गई सूरज के
जगदीश व्योम


सिमट गई
सूरज के
रिश्तेदारों तक ही धूप
न जाने क्या होगा।

घर में लगे उकसने काँटे
कौन किसी का क्रंदन बाँटे
अंधियारा है गली-गली
गुमनाम हो गई धूप
न जाने क्या होगा।

काल-चक्र
रट रहा ककहरा
गूँगा वाचक, श्रोता बहरा
तौल रहे तुम बैठ
तराजू से दुपहर की धूप
न जाने क्या होगा।

कंपित सागर, डरी दिशाएँ
भटकी-भटकी-सी प्रतिभाएँ
चली ओढ़कर अंधकार की
अजब ओढ़नी धूप
न जाने क्या होगा।

घर हैं अपने चील-घोसलें
घायल गीत जनम कैसे लें
जीवन की अभिशप्त प्यास
भड़का कर चल दी धूप
न जाने क्या होगा।

सहमी-सहमी नदी धार है
आँसू टपकाती बहार है
भटके को
पथ दिखलाकर,
खुद-भटक गई है धूप
न जाने क्या होगा।


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