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कविता

कठोर हुई जिंदगी
सोम ठाकुर


हमने तो जन्‍म से पहाड़ जिए
और भी कठोर हुई जिंदगी,
दृष्टि खंड-खंड टूटने लगी,
कुहरे की भोर हुई जिंदगी।

ठोस घुटन आसपास छा गई
कड़वाहट नजरों तक आ गई,
तेजाबी सिंधु में खटास की
झागिया हिलोर हुई जिंदगी।

चीख-कराहों में डूबे नगर
ले आए अपराधों की लहर,
दिन-पर-दिन मन ही मैले हुए
क्‍या नई-निकोर हुई जिंदगी!

नाखूनों ने नंगे तन छुए,
दाँत और ज्‍यादा पैने हुए,
पिछड़ गए हैं खूनी भेड़िए,
खुद आदम-खोर हुई जिंदगी।

जो कहा समय ने सहना पड़ा,
सूरज का जुगनू रहना पड़ा,
गाली पर गाली देती गई,
कैसी मुँहजोर हुई जिंदगी!

सुकराती आग नहीं प्‍यास में,
रह गया ‘निराला’ इतिहास में,
चाँदी की संटी खाती गई,
साहू का ढोर हुई जिंदगी।

कानों में पिघला सीसा भरा,
क्‍या अंधेपन का झरना झरा!
मेघदूत-शाकुंतल चुप हुए
यंत्रों का शोर हुई जिंदगी ।


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