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कविता

नए साल की धूप
सौरभ पांडेय


आँखों के गमलों में
गेंदे आने को हैं
नए साल की धूप तनिक
तुम लेते आना...

ये आए तब
प्रीत पलों में जब करवट है
धुआँ भरा है अहसासों में
गुम आहट है
फिर भी देखो
एक झिझकती कोशिश तो की!
भले अधिक मत खुलना तुम
पर कुछ सुन जाना।

संवादों में
यहाँ-वहाँ की;  मौसम;  नारे
निभते हैं टेबुल-मैनर में
रिश्ते सारे
रोशनदानी कहाँ कभी
एसी-कमरों में?
बिजली गुल है,
खिड़की-पल्ले तनिक हटाना।

अच्छा कहना
बुरी तुम्हें क्या बात लगी थी
अपने हिस्से बोलो
फिर क्यों ओस जमी थी?
आँखों को तुम
और मुखर कर नम कर देना
इसी बहाने होठ हिलें तो
सब कह जाना। 


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