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कविता

किंतु इनका क्या करें?
सौरभ पांडेय


खिड़कियों में घन बरसते
द्वार पर पुरवा हवा...
पाँच-तारी चाशनी में पग रहे
सपने रवा!
किंतु इनका क्या करें?

क्या पता आए न बिजली
देखना माचिस कहाँ है
फैलता पानी सड़क का
चौखट जहाँ है
सिपसिपाती चाह ले
डूबा-मताया घुस रहा है
हक जमाता है धनी-सा
जो न सोचे... ‘क्या यहाँ है?’
बंद दरवाजा, खुला बिस्तर,
पड़ी है कुछ दवा...
किंतु इनका क्या करें?

मात्र पद्धतियाँ दिखीं 
प्रेरक कहाँ सिद्धांत कोई
क्या करे मंथन,
विचारों में उलझ उद्भ्रांत कोई
रहा बाजार
फिर भी क्यों टपकता है पसीना?
सूचकांकों के गणित में
पिट रहा है क्लांत कोई
एक नचिकेता नहीं
लेकिन कई वाजश्रवा
किंतु इनका क्या करें?

सिमसिमी-सी मोमबत्ती
एक कोने में पड़ी है
पेट-मन के बीच, पर,
खूँटी बड़ी गहरी गड़ी है
उठ रही
जब-तब लहर-सी
तर्जनी की चेतना से,
ताड़ती है आँख जिसको
देह-बंधन की कड़ी है
फिर दिखी है रात जागी
या बजा है फिर सवा...
किंतु इनका क्या करें?


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