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कविता

पेड़ अगर तुम ना होते तो
हर्षवर्धन आर्य


पेड़ अगर तुम ना होते तो 
क्या मानव जीवन होता।    
बंजर - परती होती धरती 
बस सूना मरुथल होता।

बादल कौन बुलाता तुम बिन 
नीले-नीले अंबर में 
कैसे भीग-भीग धरती का 
आँचल फिर सुरभित होता

कैसे चलती मधुर बयारें 
करती अंग-संग अठखेली 
पाकर शीतल छाँव कहाँ फिर 
जन-गण-मन प्रमुदित होता।

कहाँ पनपता जंगल जीवन 
कहाँ विचरते चौपाए 
नीड़ बनाते कहाँ पखेरू
कहाँ मधुर कलरव होता।

बोलो आती कहाँ पुष्टता 
बिन औषध, फल-फूलों के 
बीमारी और लाचारी को  
मानव जन्म-जन्म ढोता।

कौन सिखाता तुम बिन बोलो  
दाता बन कर झुक जाना 
लुटा फूल-फल-पत्र-तना-जड़
कौन भला हर्षित होता।


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