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कविता

नदी की व्यथा
मधुसूदन साहा


कभी न पूछो किसी नदी से
उसकी व्यथा पुरानी

सदियों से
उसने मुश्किल के
कितने दिन काटे हैं,
कब कितने
खाई खंदक को
जीवन में पाटे हैं,
बहुत कठिन है संघर्षों की
उसकी कथा-पिहानी।

कहाँ-कहाँ
कितने घाटों पर
उसको पड़ा ठहरना,
बीहड़ के
किन-किन बाटों से
उसको पड़ा गुजरना
वह कैसे खुद कह पाएगी
सब कुछ स्वयं जुबानी।

रेत-रेत
बन गई सफर में
जीवन की अभिलाषा,
उसने दी हर रोज
पसीने की सच्ची परिभाषा,
उसकी पीड़ा जग के आगे
फिर भी रही अजानी।


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