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कविता

सन्नाटे ठहरे
इसाक ‘अश्क’


हँसी
ठहाकों के घर पर
सन्नाटे ठहरे हैं।

डूब रहे सब
सत्ता के
सैलाबी तेवर में
जंग छिड़ी
चौराहों पर
कुर्सी के चक्कर में

फूल
कली-किसलय पर भी
काँटों के पहरे हैं।

फटेहाल
फुटपाथों पर है
लोकतंत्र सोता
देख
गरीबी-बदहाली को
नहीं कोई रोता

धर्म
कर्म के अंग-अंग
क्षत-विक्षत चेहरे हैं।


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