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कविता

पत्र लिखा मन के मौसम को
धनंजय सिंह


पत्र लिखो मन के मौसम को
आओ और छा जाओ
और लिखा फिर दुःस्वप्नों को
अब अपने घर जाओ

मुझको देना अब
निंदियारी आशा को आराम।

पत्र लिखा मंजुल भावों को
रचो सुमंगल गीत
और लिखा फिर विश्वासों को
रहे अबाधित प्रीत

कुत्सा पर लग जाए जिससे
अविचल पूर्ण विराम।

पत्र लिखा बंधुत्व भाव को
सबके हृदय मिलाओ
तेरा मेरा करे तिरोहित
वह परिपाटी लाओ

दिव्य मनुजता सरसे
धरती स्वर्ग बने अभिराम

और बने तब सुख-समृद्धि का
उत्सव ललित-ललाम।


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