सदा, जूझते रहे
समय के झंझावातों से।
संबंधों के बीच
उठीं शंका की दीवारें
गगन चूमने लगी
घृणा की ऊँची मीनारें
जीना दूभर हुआ
दंभ के उल्कापातों से।
अग्निपरीक्षा देती रहती
कोमल सोनजुही
उसका तन छेदा
औरों की वेणी गई गुही
वैभव रहा खेलता
कुटियों के जज्बातों से।
संसद में भिजवाई आँखें
निगरानी करने
गांधारी का अभिनय, वे ही
वहाँ लगीं करने
मिलने लगे, तिमिर को तमगे
अब खैरातों से।