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कविता

हर तरफ आभास काला
निर्मल शुक्ल


लो सुनो,
आ गया है फिर नया
अखबार आँगन में।

जंग खाती सुर्खियाँ
सारी
प्रभावों में कसी हैं
योजना के नाम पर
जो शब्द है तब फंतासी हैं

एक विज्ञापन बड़ा-सा
और उस पर ही
टिका
व्यापार आँगन में।

चाँद की धब्बों भरी
कुछ सूरतें
हर पृष्ठ पर हैं
भार ढोती कुर्सियों के
पेट में गहरे जठर हैं

चीखते कुछ आश्वासन
और भिक्षुक
हो चुके
परिवार आँगन में।

असलहे, कविता, निठारी,
वही
बासी वर्णमाला
राज, शिक्षा, खेल, राहत
हर तरफ आभास काला

कहकहे भरते दुःशासन
और अक्सर
अस्मिता
लाचार आँगन में।


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