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कविता

कैसे बीती रात कहो
निर्मल शुक्ल


सुबह-सुबह सूरज ने पूछा
कैसे बीती रात कहो।

कोई गीत नहीं रच पाए
क्या करते रहते हो
जगत दिखावे को ही क्या
कागज काले करते हो
क्या मंचों पर ताली बजवाना
है चाह तुम्हारी
सच-सच बोलो क्या है
रचनाओं की राह तुम्हारी

क्यों मन करता तुम पर ऐसे
प्रश्नों की बरसात कहो।

कोई रचना आ चुपके से
कानों में बतियाई
या कि नए भावों की कोई
आहट पड़ी सुनाई
क्या कोई ऐसा विचार था
जिसने नींद उड़ाई
या फिर परीलोक की छवि
सपनों में रही समाई

या कि राह में अड़ा रहा
मन का कोई आघात कहो।

उतर कहीं से आया कोई
मन में धीरे धीरे
या कि कहीं मिल गए भाव के
उज्ज्वल मोती हीरे
नूतन बिंब उभर कर कोई
शब्दों में आया है
या फिर कोई गीत
जन्म लेने को अकुलाया है

यदि ऐसा है तो फिर हँसकर
उसको ‘शुभ सुप्रभात’ कहो।


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