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कविता

संकट गहरा है
रविशंकर पांडेय


धूप, हवा, पानी पर
जाने कैसा पहरा है
कालचक्र भी डर के मारे
ठहरा-ठहरा है।

टहनी सहमी-सहमी
पत्ता-पत्ता काँप रहा
जंगल जैसे दावानल का
खतरा भाँप रहा,
साँस रोककर खड़े पेड़ भी
यह बतलाते हैं
आने वाला शायद कोई
संकट गहरा है।

भय के मारे
यहाँ सभी के
चेहरे पीले हैं
सब्र दिलाने वाली सब
बेकार दलीलें हैं
भरी दोपहर में छाया
यह कैसा कोहरा है।

रंग बिरंगे
बल्ब जले थे
जिनकी आँखों में
वह पीढ़ी
दम तोड़ रही है
बंद सलाखों में
मार समय की खाने वाले
यह बतलाते हैं
आने वाला समय और भी
गूँगा बहरा है।


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