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कविता

कागज के घोड़े
रविशंकर पांडेय


सरपट दौड़ रहे
गाँवों में
ये कागज के घोड़े,
अश्वमेध के लिए
न जाने किस -
राजा ने छोड़े।

सत्ता नगर बधू
युग-युग से
रहती आई क्वाँरी
राजस्वयंवर की परिपाटी
अब भी लगती जारी
जोड़ तोड़ का जो माहिर हो
बाधाएँ वह तोड़े।

इन सफेद घोड़ों पर बैठे
हैं सवार कुछ काले
अंकों के विष बुझे तीर
लेकर शब्दों के भाले,
लहराते हैं साम दाम के
रंगभेद के कोड़े।

गली मुहल्ले थर्राए,
घोड़ों की टापों से
बच्चे सहमे नए नए
इन माई बापों से,
धर्मराज भी खड़े हुए
गुमसुम हाथों को जोड़े।


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