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कविता

सहना मुश्किल है
रविशंकर पांडेय


शोर खोखले नारों का
अब सहना मुश्किल है
कोलाहल के महाद्वीप में
रहना मुश्किल है।

समय जुगाली करता रहता
है बैठे ठाले
डसने को आतुर
अवसादों के
अजगर काले,
संत्रासों के किले
इस तरह
ढहना मुश्किल है।

रोज बज रहे
जोर शोर से गाजे बाजे हैं
बेजुबान -
कुछ लोगों की
घुटती आवाजें हैं,
ऐसे में कुछ भी
खुलकर के
कहना मुश्किल है।

बहती गंगा में
जैसे कुछ
हाथ धो रहे हैं
फूटी किस्मत पर
अपनी कुछ
लोग रो रहे हैं,
कुछ तो ठहरे द्वीप
द्वीप का बहना मुश्किल है।


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