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कविता

प्रथाएँ तोड़ आए
यश मालवीय


छोड़ आए छोड़ आए
छाँव के क्षण
बहुत पीछे छोड़ आए

बहुत मुश्किल था
स्वयं को बाँध पाना
मुट्ठियों में रेत का
कैसा ठिकाना
तोड़ आए, तोड़ आए
पाँव से लिपटी
प्रथाएँ तोड़ आए

थकन भी क्या कहें
जो आँख लगती
कहीं कोई रोशनी थी
साथ जगती
जोड़ आए, जोड़ आए
अनकहे कल में
कथाएँ जोड़ आए

लोग थे औ' जेब में थे
कई चेहरे
रास आए नहीं पर
सपने सुनहरे
मोड़ आए, मोड़ आए
हमें मुड़ना था
दिशाएँ मोड़ आए


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