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कविता

मुंबई
यश मालवीय


साँस साँस
बस अपने लिए तरसना होता है
सुबह हुई
जूते के फीते कसना होता है

लेनी पड़ती होड़ बसों से
लोकल ट्रेनों से
फूल फूल सपनों की लाशें
न उठती क्रेनों से
गर्दन तक गहरे दलदल में
धँसना होता है

सिर ही सिर सीढ़ी पर उगते
भीड़ समंदर होती
बोरीवली बांद्रा वीटी
बोरीबंदर होती
पहिया लेकर चक्रव्यूह में
फँसना होता है

बार जुआघर होटल
डिस्को पार्टी रोशन होते
होटों पर जलती सिगरेट
पर बुझे बुझे मन होते
पीकर पागल सा
रोना या हँसना होता है


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