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कविता

पुए पकाना पानी में
यश मालवीय


तरह-तरह के जादू-टोने
चलते हैं रजधानी में
तुम क्या समझोगे लोगों का
पुए पकाना पानी में

दाँतों तले दबाना ऊँगली
बड़े-बड़े आला चेहरे
बुनते रहते हैं अपनी ही
आँखों में जाला चेहरे
रावण से सपने होते हैं
इनकी रामकहानी में

काट न पाते दिन
उम्मीदों से खुद ही कट जाते हैं
रत्नजटित औजार देखकर
आपस में बँट-बँट जाते हैं
हम अपनी पहचान खो रहे
झूठी बोली-बानी में

भूल वर्णमाला जीवन की
जाति-वर्ण को पोस रहे
कोस रहे हैं उजियारों को
खुद ही काले कोस रहे
करवट लेते महल-अटारी
टूटे छप्पर-छानी में


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